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Friday, 5 February 2016

पत्र तुम्हारे नाम

इस बात की नाराजगी नहीं है कि तुमने अलविदा कह दिया। नाराजगी इस बात से है कि तुम्हे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। हालाँकि मेरा मन अभी भी इस बात की गवाही देने को तैयार नहीं है कि तुम सच में खुश हो या तुम अपने ख्वाहिसों को दबा नहीं रही। खैर, मैं अंदर से कुछ भी मानु उसे कर्म का रूप तब तक नहीं दे सकता जब तक कि तुम खुल कर या इशारों में भी इस बात की पुष्टि न कर दो। समय के साथ मनुष्य खुद को ढाल ही लेता है। तुम भी ढाल ही लोगी। लेकिन ये तो भविष्य की बातें है। अभी अगर तुम्हारे दिल के किसी भी कोने में रिश्तों की अहमियत बाकि है तो एक हामी की देरी है। डरो मत कि आगे क्या होगा, हम रास्ता बना लेंगे। बस एक बार कह दो कि तुम्हे हमसे मोहब्बत है। अगर नहीं है मोहब्बत तो कुछ सवालों का जवाब ही दे दो। वो क्या था जब तुमने  कहा था कि तुम्हे सिर्फ मुझसे मोहब्बत है? क्या तुम झूठ बोल रहे थे? अगर झूठ बोल रहे थे तो वाकई तुम्हारी रिझाने की कला की दाद देता हूँ। लेकिन अगर वो बातें उस वक़्त सच थी तो फिर किसी की चाहत इतनी बदल कैसे सकती है? मेरी चाहत में तो गाढ़ता आ गई तो फिर तुम्हारी कैसे धुंधली हो गई? धुंधली भी नहीं मिट ही गई। मुझे शिकायत नहीं है तुमसे। बस समझना चाहता हूँ इस संसार को। अगर हार मिली तो कबूल करने में परेशानी नहीं है। लेकिन हार की वजह भी न जान सका तो ज़िन्दगी भर मलाल रहेगा। और शायद ये विश्वास भी कि तुम लौट कर आओगी। चली जाना, मैं रोकूँगा नहीं पर पहले मुझे इस बंधन से तो मुक्त कर दो। मुझे कोई कहानी नहीं सुननी है तुमसे। उम्मीद है तुम सुनाओगी भी नहीं। सिर्फ सच जानना चाहता हूँ । चाहे वो कितनी ही कड़वी हो। मुझमे सच हजम करने खूबी बहुत है ये पता है तुम्हे। मलाल तो और भी है पर वो सारी बातें छोटी पड़ जायेगी अगर सच जान गया तो। बस एक बार अपनी कहानी तुम अपने मन से सुना दो। जो तुमने सुना, सोचा, कहा या फिर महसूस किया। जो भी तुम्हारे मन में एहसास जगे और फिर धूमिल होते गए। सब सुना दो। हक़ीक़त सुना दो। अपनी कहानी सुना दो। जो शायद तुमने कभी किसी से नहीं कहा होगा, अपने मन में दबा रखा होगा। बस एक बार मुझको बता दो। इस बात का भी ज़िक्र करना कि तुम छुप कर बातें करते थे मुझसे। इस हद तक ज़िक्र करना कि कैसे गर्मियों में भी कम्बल ओढ़ते थे सिर्फ इसलिए कि गुफ्तगू करनी थी मुझसे। ये भी बताना कि पूछता था मैं तुमसे "मेरी बनोगी न?" जवाब भी बताना जो तुम कहा करते थे "जरूर बनूँगी! ग़र आपकी नहीं तो किसी की नहीं"। उस डायरी के पन्ने भी सुनाना जिनमे तुम मेरा नाम लिखती थी और काट देती थी। ये भी बताना कि जिस डायरी में तुम अपने जज्बात लिखती थी उसमे मेरी बातों ने कैसे जगह ले लिया। सच बताना! कहानी मत सुनाना। हो सकता है तुम्हे ये सब सुनाने में असहज लगे  तो मुझे मत सुनाओ। उसे सुना दो जिसके साथ ये बातें करने में सहज हो और कहो उससे कि वो मुझतक पहुंचा दे। मुझे यकीं है, नहीं होगा कोई मेरे सिवा जिससे तुम अपने जज्बातों की इस गहराई को सुना सको। पर इतना मत सोचो, मैं तो हूँ जिसे तुम सुना सकती हो। मुझे ही बता दो। लिखकर ही बता दो। फिर से गुज़ारिश करता हूँ तुमसे मुझे जिंदगी भर के लिए जज्बाती अपाहिज मत बनाओ। तुम अपने जज्बात सुना दो, मेरे हार को वजह मिल जायेगी और मैं आगे बढ़ पाउँगा। हाँ लेकिन बनावटी कहानी मत सुनाना। सच बताना।
तुम्हारा
चन्दन

3 comments:

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