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Sunday, 9 February 2014

गाँव से शहर

एक तरफ जहाँ लोग इतने काबिल या आधुनिक हो गए हैं कि नए नए नियम बनाने लगे हैं और दूसरी तरफ जिन्दगी तो बस गुजारने की इच्छा से जी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें पैसों की पहचान नहीं है, आधुनिकता का आगाज़ नहीं है; पैसे उनके लिए भी मायने रखती है पर उनकी अपनी एक सीमाएं बंधी है। जहाँ के उस पार सिर्फ इंसानियत है, भाईचारा है, एक दुसरे को जीने देने और खुद भी जीने की ललक है। लेकिन ये सब बदल रहा है, वहां भी इंसानियत खोती जा रही है। कल तक जो पिछली पीढ़ी खेती के अलावे गाँव कस्बों में कुछ और रोजगार करने की सोचते थे और करते थे आज अब की पीढ़ी वहां से निकलती जा रही है। सभी बड़े बड़े शहरों में जा रहे हैं अनजान लोगों के बीच। किसी को जब मैंने बचपन में देखा था याद नहीं फिर वो कभी गाँव वापस आया भी या नहीं। सोचता हूँ मैं आज से 20 साल बाद जब ये बड़े बुज़ुर्ग गुजर जायेंगे तो गाँव कहीं सुना न हो जाये क्योंकि 80% बच्चे तो गाँव छोड़ देते हैं अपने भविष्य के लिए और एक नयी जिन्दगी की जद्दो जिहद में लगे रहते हैं।