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Saturday, 13 December 2014

A Chapter from "Jara si Life" a radio show hosted on Fever 104.8 FM by Richa

I was turning pages of my diary and I found a page which I wrote while listening a Radio Channel "Fever". I sometime get opportunity to listen to such a wonderful show. There was a incident which a took noted in my diary. The story was told by a girl, her own story, but I could not find the character who should be blamed. Please help me to locate the person to be blamed with logic.

There is a girl who fell in love with a boy but their parents were against that marriage. She elope with him and got married.

They were residing in a city but were not settled. After few days the money with him were spent and there were no way to run the life. The boy realized that he had did a big mistake, it should not had been done and now he should go back to home. The girl had no option but to go back.

Girl's parents decided to get her married as soon as possible with any boy whatever and arranged with a NRI guy.

After one and half year the girl came to know the guy she had been married to was already married and had no children due to which he got married again. The shocking part was that the girl's parents knew all the facts but didn't tell her. But now, she has no option rather just to pass her entire life in sadness.

I don't know the entire scene. This was what all she said to Richa.
After brief facts of the story, examine the facts and state who is guilty?

Monday, 25 August 2014

माँ का प्यार: अनसुलझी रहस्य

कहते हैं न की किसी के महत्व का अहसास तब होता है जब वो हमारे पास न हो। सही है शत-प्रतिशत सही है। उसी न होने में एक अहसास माँ का पास न होना भी है। स्मरण है मुझे जब भी माँ पास होती है तो किसी बात को छुपाना बड़ा मुस्किल होता है खासकर अगर वो पीड़ा हो। किसी भी अनियमित व्यवहार को बिना बताये परख लेती है माँ। लेकिन वही व्यवहार अगर किसी और के सामने हो तो परखना तो दूर पर प्रश्न जरूर उठ जाते हैं।कभी कभी सोचता हूँ कि हर स्त्री कभी न कभी किसी किसी की माँ कहलाने का सौभाग्य प्राप्त करती है । ऐसा क्या है जो उसे अपने संतान से इस तरह जोड़ देती है कि उसे अपने संतान के हर पीड़ा की अनुभूति पहले ही ज्ञात हो जाती है? ऐसा भी नहीं कह सकता कि उनका यही प्रेम हर मनुष्य के लिए होता है। जो अगाध प्रेम माँ का अपने  संतान से होता है , जिस मनसा से वो अपने संतान का रक्षण करती है, वही मनसा अगर सबके साथ हो तो कैसा होगा? शायद किसी को माँ की कमी का अहसास नहीं होगा, शायद किसी को पीड़ा बताने का कष्ट न करना पड़ेगा, शायद किसीको किसी स्त्री के प्रति संदेह ना होगा, शायद किसी स्त्री के मन में किसी से इर्ष्य ना होगी। पर जानता हूँ ये मुमकिन नहीं है। अगर संसार में बुराई है तभी अच्छाई का महत्व है। अगर किसी के मन में इर्ष्या है तभी शायद प्रेम का भी महत्व है। बातें समाप्त नहीं हुई है, सवाल और भी हैं पर जेहन में है...

-Chandan

Friday, 15 August 2014

आज़ादी के कुछ रंग मेरी नज़रों से...

हर साल इसी दिन, गीतों या भाषणों में ही सही, सब अपने देश को याद करते हैं| कुछ रंग मैंने भी देखे हैं इस आज़ादी के तो सोचा की साझा करूँ आपसे कुछ ऐसे रंग जो आज सोचने पर मजबूर कर दिया...

एक रिक्से वाले से स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हुए पूछा कि उनको कैसा लग रहा है, जवाब निरासा-जनक था- " आज की छुट्टी होती ही क्यों है ? सवारी मिलता ही नहीं! अगर आज नहीं कमाया तो शाम को बच्चों को क्या खिलाएंगे?"

काफी कहूँ तो नाइंसाफी होगी लगभग सभी दोंस्तों से स्वंतत्रता दिवस की मुबारकबाद आई पर एक सन्देश ने चौंका दिया- " bad news for Bihar यही अच्छे दिन आने वाले थे अब बिहार में साला एक मुसहर तिरंगा फहराएगा"

आज भर के लिए भिखारियों को पुलिस हर बार सड़कों से हटा देती है | मेट्रो, सड़क, रेड लाइट कहीं भी भिखारी नज़र नहीं आया| क्या ये हमेशा के लिए नहीं हट सकता| सबको पता है की इन भिखारियों के माध्यम से कुछ गिनती के लोग पैसे कमाते है, भिखारी लोग तो बस उनके यहाँ नौकरी करते हैं जिसके बदले उसे दो वक़्त की रोटी मिल जाती है|

प्रधानमंत्री का भाषण सुना, काफी अच्छा लगा हालाँकि उम्मीदें और भी बहुत थी कि वो अपनी काम की बातें करेंगे लेकिन वो देश को घर के मुखिया की तरह समझा रहे थे | हर नागरिक को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास करा रहे थे | ये अपनापन देख कर कुछ देर को लगा की ये संबोधन लाल बहादुर शास्त्री जी कर रहे हैं| लेकिन फिर भी निराशा हैं कि जो बातें उन्होंने कहा उनपर कितना अमल लोग करेंगे| फिर से कल वही सुबह होगी और फिर वही दुनिया देखने को मिलेगा " मेरा क्या मुझे क्या, तू हिन्दू तू मुसलमान, तू ब्राह्मण तू शुद्र"

सम्पूर्ण आज़ादी तो सही मायने में नहीं मिली है अभी बहुत से कार्य करने बाकी हैं| मैं कोई सलाह नहीं देना चाहता बस इतना याद रखिये इस देश को बनाने में आपकी एक कदम बहुत मायने रखती है | गीतों में ना सही, किसी दिवस पर ना सही पर अपने कर्म में देशभक्ति लानी जरूरी है| जाति, धर्म, लालच से ऊपर उठने की जरूरत है |

Sunday, 11 May 2014

अस्पताल के बिस्तर से...

बाहर मौसम बहुत सुंदर है, हलकी ठंडी हवा बह रही है और कभी कभी बूंदा-बूंदी बारिश भी हो रही है| देखता हूँ खिड़की से बाहर दो बच्चे खेल रहे हैं सड़क पर - कभी बारिश के बूंदों का अहसास लेकर कभी ठंढी हवाओं का आह भरकर| मेरा भी मन कर रहा है बारिश में भीगने का, हवाओं को महसूस करने का लेकिन मैं बाहर नहीं जा सकता, डाक्टर ने मना किया है कहते हैं की मैं बाहर नहीं जा सकता , मैं उठ नहीं सकता, मैं उनकी बात सुन कर खामोश रह जाता हूँ | मुझे पिछले एक महीने से इसी कमरे में बंद कर दिया है तब से न सूरज को देखा न ही रात में अपना आकर बदलते चाँद को| सब लोग कहीं चले गए हैं किसी की आवाज़ भी नहीं सुनाई देती है| मैंने माँ से पूछा तो कहती है कि मैं बीमार हूँ इसलिए डाक्टर ने सोने के लिए कहा है जब तक की मैं ठीक नहीं हो जाता| मुझे क्या हुआ है? माँ कहती है कि कुछ नहीं बस मैं थक गया हूँ न इसलिए कुछ दिन आराम कर लूँगा तो ठीक हो जाऊँगा| सुबह- सुबह मुझे उठाया जाता है मेरे बिस्तर बदले जाते हैं और फिर मुझे सब दोबारा सुला देते हैं| मेरे दोस्त आये थे मिलने मुझसे, कह रहे थे बाहर मौसम बहुत अच्छा है लेकिन मुझे नहीं पता कितना अच्छा है| अस्पताल के बाहर एक पेड़ है, खिड़की से देखता हूँ तो उसके पत्ते तेजी से हिलते दिखाई देते हैं लेकिन मुझे उस पत्तों की सरसराहट भी सुनाई नहीं देती| डाक्टर ने खिड़की खोलने मना किया है| डाक्टर कहते हैं कि बाहर कभी ठण्ड और कभी गर्मी हो रही है जो कि मुझे और भी बीमार कर सकती है| लेकिन सभी तो खेल रहे हैं बाहर तो फिर मैं क्यों नहीं? मैं सुबह से शाम और शाम से सुबह तक बिस्तर पर लेटा रहता हूँ, माँ खाना लाती है और अपने हाथों से खिलाती है, मैं अपने हाथ से नहीं खा सकता, मेरे हाथ में हमेशा सुईं चुभी रहती हैं| लेकिन अब मैं माँ से रूठा हूँ, मैंने दो दिन से बात नहीं किया है माँ से क्योंकि मुझे हमेशा खिचड़ी देती है खाने के लिए, कहती है कि मैं मिर्च मसाले नहीं खा सकता लेकिन पहले तो खाता था तो अब क्यों नहीं खा सकता? बचपन में मुझे जब बुखार लगता था तो दादा जी चावल खाने से मना कर देते थे तब मुझे ना मेरी मम्मी चुपके से गरम-गरम चावल खिलाती थी और मैं ठीक हो जाता था | माँ को पता है मुझे चावल बहुत पसंद है और साथ में तीखी सब्जी| सब आपस में बात करते हैं कि मैं बीमार हूँ| कल भी गाँव से फ़ोन आया था, मेरी माँ ने बताया कि मैं अभी एक सप्ताह और अस्पताल में रहूँगा| लेकिन तब तक मौसम फिर से बदल जायेगा और मैं इस मौसम को महसूस नहीं कर पाऊंगा| लेकिन आज डाक्टर ने सुबह सुबह मेरी माँ को बुलाया था और माँ मुझे अकेला छोड़ कर चली गई थी और वापस आई तो मैंने देखा कि माँ की आँखे नम थी| मैंने पूछा तो बोली कि रो नहीं रही थी मुह धोकर आई है इसलिए आँख भींगी हुई है और डॉक्टर ने कहा है की मैं कल अस्पताल से जा सकता हूँ| मैं कल का इंतज़ार कर रहा हूँ, कल से मैं फिर से सबकुछ खा सकता हूँ और हाँ मुझे बारिश में भी भीगना है लेकिन ये रात जल्दी जाती क्यों नहीं, मुझे लगता हैं कि भगवान ने दो-तीन रात मिलाकर ये रात बनाई है| लेकिन अब मुझे बहुत जोर से नींद आ रही है लेकिन मैं सोना नहीं चाहता, कल का सुबह देखना है मुझे और अगर सो गया तो जल्दी नहीं उठूँगा| माँ हमेशा कहती है कि मैं सुबह देर से उठता हूँ| लेकिन मुझे बहुत तेज नींद आ रही है और मैं अपनी आँख अब और खुली नहीं रख सकता...
© Chandan

Tuesday, 8 April 2014

जाति-पाति रंग-रूप और पैसा भाग-१

मैं एक बार किसी महात्मा से मिला या यूँ कहें कि अपने कुलगुरु से मिला जो हमेशा मुझे नास्तिक समझते हैं। मैंने उनसे कुछ साधारण से सवाल किये कि जाति-पाति का क्या महत्व है? उन्होंने कहा जाति होता क्या है भगवन ने हमें सिर्फ इंसान बनाया और हम सिर्फ इंसान हैं न हिन्दू न मुस्लमान। मैंने पूछा की क्या यह सिर्फ कहने-सुनने की बातें है या धरातल पे भी है? उन्होंने कहा हाँ बिलकुल है। मैंने फिर पूछा क्या अगर मैं किसी मुस्लिम कन्या से विवाह करूँ तो आपकी मंजूरी होगी? उन्होंने कहा - विवाह स्वजातीय होनी चाहिए।
ठीक यही सवाल मैंने उनके परम शिष्य से पूछा उनका जवाब था - धरातल पे विरले ही देखने को मिलता है लेकिन सच यही है की हम सिर्फ इन्सान हैं। और अगर आप किसी भी कन्या से विवाह करें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
मुझे पता चला की गुरु जी  अपने उस परम शिष्य के लिए कन्या की तलाश में हैं। मैंने जानने की कोशिस की कि उनका मापदंड क्या है किसी कन्या को चुनने का। पता चला कन्या गोरी होनी चाहिए, पढ़ी लिखी होनी चाहिए,  और तो और उन्हें एक चार चक्का गाड़ी की भी दरकार थी। मुझसे रहा न गया मैं फिर उनसे सवाल किया। गुरूजी , आपके मापदंड में गोरी होना क्यों अवश्यक है?  अगर कोई काली या सव्न्ली है तो उसमे उसका क्या दोष? जवाब में वो गुस्सा कर गए- मुझे तुम व्यावहारिकता का ज्ञान मत दो मुझे इस चीज़ की समझ अच्छी है।और आध्यात्मिकता को इससे मत जोड़ो।
मेरे समझ में ये आजतक नहीं आया कि दोनों स्वतंत्र कैसे हो सकते है? आप इस दुनिया में रहते हैं तो व्यावहारिकता से बच नहीं सकते और अगर किसी का खून करना व्यवहारिकता में गलत है तो अध्त्यम इसे सही करार कैसे दे सकती है?
मेरे सवालों का जवाब तो नहीं मिला लेकिन एक सलाह मिली उनके परम शिष्य से कि आप ओशो का अध्यन कीजिये आपको जबाब मिलेगा। ओशो को तो नहीं पढ़ सका अब तक कोशिश जरूर  करूँगा जबाब जानने की।

Saturday, 8 March 2014

Saturday, March 08, 2014

जब भी खुद के साथ वक़्त बिताता हूँ या बिताने का मौका मिलता है तो लगता है जैसे की मैं किसी राह में फंस गया हूँ। ये घर और ये आवाजें उस रात में चलती रेलगाड़ी से बाहर बसे शहरों की तरह लगता है। जहाँ इंसान तो रहते हैं पर कोई जानता नहीं, जो मेरा ठिकाना नहीं है। भूलकर भी उस स्टेसन पर उतरने की गुस्ताखी नहीं करना चाहता। कहीं मुझे इस रस्ते में अनजान लोगों के बीच न रहना पड़े। जो हमारे नहीं हैं। फिर हमारा कौन है? क्या गाँव में बसे चौपाल पे हो रही चर्चाएँ हमारी है या उस माहौल में बच्पनो का बीतना हमारा है ...है नहीं था... हर रिश्तों से एक न एक दिन दुरी बन जाती है... आगे जो बढ़ना है... इसी दुरी को सफ़र करने के बीच का बसा घर लगता है ये... वही गाड़ियों की आवाज भी है, वही सोचने का वक़्त भी है... पर नहीं है तो बस सुनने वाला... वहां भी कौन सुनता था! खुद ही सोची हुई बातें मंजिल आने पे भूल जाते हैं। फर्क बस इतना है कि उस सफ़र की मंजिल पता थी रास्ता नहीं लेकिन इस सफ़र रास्ता पता है मंजिल नहीं...

Sunday, 9 February 2014

गाँव से शहर

एक तरफ जहाँ लोग इतने काबिल या आधुनिक हो गए हैं कि नए नए नियम बनाने लगे हैं और दूसरी तरफ जिन्दगी तो बस गुजारने की इच्छा से जी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें पैसों की पहचान नहीं है, आधुनिकता का आगाज़ नहीं है; पैसे उनके लिए भी मायने रखती है पर उनकी अपनी एक सीमाएं बंधी है। जहाँ के उस पार सिर्फ इंसानियत है, भाईचारा है, एक दुसरे को जीने देने और खुद भी जीने की ललक है। लेकिन ये सब बदल रहा है, वहां भी इंसानियत खोती जा रही है। कल तक जो पिछली पीढ़ी खेती के अलावे गाँव कस्बों में कुछ और रोजगार करने की सोचते थे और करते थे आज अब की पीढ़ी वहां से निकलती जा रही है। सभी बड़े बड़े शहरों में जा रहे हैं अनजान लोगों के बीच। किसी को जब मैंने बचपन में देखा था याद नहीं फिर वो कभी गाँव वापस आया भी या नहीं। सोचता हूँ मैं आज से 20 साल बाद जब ये बड़े बुज़ुर्ग गुजर जायेंगे तो गाँव कहीं सुना न हो जाये क्योंकि 80% बच्चे तो गाँव छोड़ देते हैं अपने भविष्य के लिए और एक नयी जिन्दगी की जद्दो जिहद में लगे रहते हैं।